कोलेजियम के प्रस्ताव का विरोध : आयातित वकीलों को हाईकोर्ट जज बनाना संविधान का उल्लंघन

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इलाहाबाद हाईकोर्ट में बाहरी वकीलों को जज नियुक्त करने के कोलेजियम के प्रस्ताव का हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने कड़ा विरोध जताया है। एसोसिएशन ने भारत के मुख्य न्यायमूर्ति को पत्र लिखकर आपत्ति जताते हुए कहा है कि इलाहाबाद और लखनऊ खंडपीठ में केवल यहीं पर प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ताओं को ही न्यायमूर्ति नियुक्त किया जाए।
बार एसोसिएशन केअध्यक्ष आरके ओझा ने शनिवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि बार एसोसिएशन आयातित वकीलों को हाईकोर्ट जज बनाने के प्रयास का विरोध करते हुए मांग करती है कि लखनऊ पीठ सहित इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करने वाले वकीलों को ही हाईकोर्ट का जज बनाया जाए।

उन्होंने विभिन्न न्यायाधिकरणों में सेवानिवृत्त प्रशासनिक तथा न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का भी विरोध किया। कहा, इनमें चयन प्रक्रिया के तहत योग्य वकीलों की नियुक्ति की जाय। सेवानिवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति से अधिकरण सफेद हांथी ही साबित हो रहे हैं। वह न्याय नहीं कर पा रहे हैं। देश के सभी हाईकोर्ट के बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा महासचिव से चर्चा की जाएगी और प्रदेश के बार संगठनों से परामर्श कर निर्णय लिया जाएगा।

बोले, प्रदेश सरकार उप्र राजस्व न्यायिक सेवा कैडर का गठन करे। साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों के बजाय चयन प्रक्रिया के तहत योग्य वकीलों की नियुक्ति की जाय। प्रशासनिक अधिकारियों को कानूनी जानकारी न होने के कारण वादकारियों को न्याय के लिए भटकना पड़ता है, उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। राजस्व न्यायालय के अधिकारी प्रशासनिक काम में ही व्यस्त रहते हैं, अदालतों में नहीं बैठते।

कहा, संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत केवल हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को ही हाईकोर्ट जज नियुक्त करने का उल्लेख किया गया है। इसके लिए राज्यपाल की सहमति भी ली जाती है। राज्य सरकार बाहरी वकीलो के बारे में कैसे परामर्श दे सकती है। जब कोलेजियम के जजों ने बाहरी वकीलों की योग्यता देखी नहीं तो किसी के कहने पर नाम भेजना संविधान की मंशा के विपरीत है। बाहरी वकीलों को स्थानीय कानूनों सहित न्यायालय की परंपरा प्रक्रिया की भी जानकारी नहीं होती, जिससे वकीलों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

महासचिव एसडी सिंह जादौन ने कहा, हाईकोर्ट के 17 हजार वकीलों में क्या योग्य अधिवक्ता नहीं है जो आयातित करना पड़ रहा है। प्रदेश के बाहर के मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त करने की भी खिलाफत करते हुए उन्होंने कहा, हाईकोर्ट का ही जज मुख्य न्यायमूर्ति होने से बार की समस्याओं का आसानी से हल निकाला जा सकता है।

जब 160 जजों के पद  हैं तो सभी पदों को भरने के लिए नाम क्यों नहीं भेजे जाते। इस समय हाईकोर्ट में केवल 100 जज हैं। 60 पद खाली हैं और 16 नाम भेजे गए हैं। उसमें से भी चार नाम सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के है जिनके बारे में हाईकोर्ट कोलेजियम को कोई जानकारी नहीं, फिर भी उन्हें जज बनने योग्य माना गया है। ऐसा करके हाईकोर्ट के योग्य वकीलों की अनदेखी की गई है।

बार एसोसिएशन के पुस्तकालय हाल में हुई प्रेसवार्ता में पूर्व अध्यक्ष आईके चतुर्वेदी, पूर्व महासचिव ओपी सिंह, अशोक कुमार सिंह, एसी तिवारी, सीपी उपाध्याय, प्राणेश त्रिपाठी, आशुतोष त्रिपाठी, मनोज मिश्र, नीरज त्रिपाठी, प्रशांत सिंह, अरुण सिंह आदि मौजूद थे।

न्यायिक कार्य से विरत रहने से हाईकोर्ट में न्यायिक कार्य प्रभावित
इलाहाबाद हाईकोर्ट में बाहरी वकीलों को हाईकोर्ट जज बनाने के प्रयास के विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकीलों की हड़ताल के कारण न्यायिक कार्य बुरी तरह प्रभावित हुआ। अदालतें बैठीं किंतु वकीलों की गैर मौजूदगी की वजह से वापस चली गईं। शनिवार को भी हाईकोर्ट खुला था लेकिन वकील नदारद रहे। बार एसोसिएशन ने बाहरी वकीलो को हाईकोर्ट जज बनाने का कड़ा विरोध किया है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट में बाहरी वकीलों को जज नियुक्त करने के कोलेजियम के प्रस्ताव का हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने कड़ा विरोध जताया है। एसोसिएशन ने भारत के मुख्य न्यायमूर्ति को पत्र लिखकर आपत्ति जताते हुए कहा है कि इलाहाबाद और लखनऊ खंडपीठ में केवल यहीं पर प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ताओं को ही न्यायमूर्ति नियुक्त किया जाए।

बार एसोसिएशन केअध्यक्ष आरके ओझा ने शनिवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि बार एसोसिएशन आयातित वकीलों को हाईकोर्ट जज बनाने के प्रयास का विरोध करते हुए मांग करती है कि लखनऊ पीठ सहित इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करने वाले वकीलों को ही हाईकोर्ट का जज बनाया जाए।

उन्होंने विभिन्न न्यायाधिकरणों में सेवानिवृत्त प्रशासनिक तथा न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का भी विरोध किया। कहा, इनमें चयन प्रक्रिया के तहत योग्य वकीलों की नियुक्ति की जाय। सेवानिवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति से अधिकरण सफेद हांथी ही साबित हो रहे हैं। वह न्याय नहीं कर पा रहे हैं। देश के सभी हाईकोर्ट के बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा महासचिव से चर्चा की जाएगी और प्रदेश के बार संगठनों से परामर्श कर निर्णय लिया जाएगा।

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